यह तो हम सभी जानते हैं कि कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है परंतु क्या आप जानते हैं भारत में एक ऐसा गांव है जिसे भगवान का बगीचा कहा जाता है। 2003 में इस गांव को भारत ही नहीं बल्कि एशिया के सबसे स्वच्छ गांव का दर्जा दिया गया था। यूनेस्को ने इस गांव में बने एक प्राकृतिक पुल को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दिया है। आइए भगवान का बगीचा कहे जाने वाले इस गांव की सैर करके आते हैं:-

एशिया के सबसे स्वच्छ गांव का नाम क्या है, कहां स्थित है
पूरे विश्व में अपनी पहचान बना लेने वाले भारत के इस गांव का नाम है मौलिन्नोंग (Mawlynnong) जिसे भगवान का बगीचा (God's garden) कहते हैं। इसलिए नहीं क्योंकि यह अंधविश्वास है बल्कि इसलिए क्योंकि यहां प्रकृति और इंसान एक दूसरे का ख्याल रखते हैं। यह गांव शिलांग में से मात्र 78 किलोमीटर की दूरी पर है। इस गांव की आबादी मात्र 900 नागरिक है। कुछ पर्यटकों ने अपने अनुभवों के दौरान इस गांव का नाम माओलिनोंग अथवा मावलिनोंग भी लिखा हैै। 


नाम के साथ पिता नहीं है माता का सरनेम लगाया जाता है
आप जानकर चौक जायेंगे कि इस गांव में साक्षरता की दर 90% से अधिक है और यहां महिलाएं एवं पुरुष समान रूप से काम करते हैं। इस गांव में खासी जनजाति के लोग रहते हैं। सबसे खास बात यह है कि इस गांव के बच्चे अपने नाम के साथ अपनी मां का सरनेम लगाते हैं। यानी बच्चों की पहचान उनके पिता से नहीं बल्कि माता से होती है। स्वभाविक ए प्रॉपर्टी में लड़कियों का बराबर का हिस्सा होता है और यह परंपरा सुप्रीम कोर्ट की किसी भी फैसले और भारत सरकार के किसी भी कानून बनने से पहले की है।


स्वच्छता का स्तर: पूरे गांव में एक सूखी पत्ती तक सड़क पर नहीं मिलती
2003 में इस गांव को एशिया का सबसे साफ सुथरा गांव घोषित किया गया था। इस गांव में प्लास्टिक एवं धूम्रपान प्रतिबंधित है। पूरे गांव में आपको कूड़ा कचड़ा तो दूर, सूखी पत्तियां भी सड़क पर नहीं मिलेंगी। हर घर के बाहर बैंबू से बना हुआ डस्टबिन नजर आता है और सड़कों की सफाई ग्राम पंचायत नहीं बल्कि गांव के लोग खुद करते हैं।


पेड़ों की जड़ों से बना पुल वर्ल्ड हेरिटेज घोषित 
जब गांव के लोग प्रकृति का ध्यान रखते हैं तो प्रकृति में गांव के लोगों का ध्यान रखती है। सैकड़ों साल पुराने पेड़ों की जड़ों से यहां एक प्राकृतिक पुल बन गया है। यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज घोषित किया है। इस पुल पर एक बार में 70 लोग यहां से वहां जा सकते हैं। गांव के बुजुर्गों बताते हैं कि लगभग हर 50 साल में यह बोल अपने आप बन जाता है।