नालंदा तक्षशिला जैसे अनेक विश्वविद्यालय इस देश में थे। देश की शिक्षा व्यवस्था की पूर्ति तो स्थानीय गुरुकुल ही कर लेते थे। उच्च स्तरीय एवं अंतरराष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था का प्रबंध यह विश्वविद्यालय करते थे। देश-देशांतरों की भाषाएं वहां पढ़ाई जाती थीं, जिनमें पारंगत होकर अपने को विश्व सेवा के लिए समर्पित करने वाले महामानव विश्व के कोने-कोने में पिछड़े क्षेत्रों को पिछड़े वर्ग को हर दृष्टि से ऊंचा उठाने के लिए अपनी अहैतुकी सेवा भावना की अजस्र वष्रा करते थे। न केवल धर्म और अध्यात्म वरन कृषि, पशुपालन, वृक्षारोपण, शिल्प उद्योग, नौकायन, चिकित्सा, वास्तु, रसायन आदि भौतिक विज्ञान की अनेकानेक धाराओं से संसारवासियों को परिचित प्रवीण कराने के लिए अथक परिश्रम किया गया। फलत: मानव जाति को अपनी पिछड़ी हुई, अभावग्रस्त एवं विपन्न स्थिति से छुटकारा मिला। अन्न, वस्त्र निवास और शिक्षा की आरंभिक आवश्यकताएं पूरी होने पर प्रगति के अन्यान्य मार्ग खुले।  
मनुष्य जीवन की गरिमा दो पहिये के रथ पर चढ़कर गतिशील होती है। एक पहिया है आत्म निर्माण, दूसरा लोक-निर्माण। यही दो लक्ष्य भारतीय संस्कृति के दो अविछिन्न अंग रहे हैं। गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से इस देश के निवासी निरंतर प्रयत्नशील रहे कि उनका व्यक्तित्व सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से परिपूर्ण हो। उसे आदर्श और अनुकरणीय माना जाए। यहीं थी उन दिनों व्यक्तिगत जीवन की आध्यात्मिक महात्वाकांक्षा। भौतिक दृष्टि से हर व्यक्ति समुन्नत, सुव्यवस्थित और साधन संपन्न जीवन जीता था और उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्त्तव्य हर किसी के लिए प्रगति का मापदण्ड बना हुआ था। भारतीय जीवन का दूसरा लक्ष्य था- लोक निर्माण। वह मनुष्य क्या जो अपनी उपलब्धियों से केवल अपने शरीर और परिवार को ही लाभान्वित करे. पीड़ा और पतन के गर्त से गिरे हुए- पिछड़े हुए और असमर्थ लोग जिससे कुछ भी प्रकाश एवं सहयोग प्राप्त न कर सके.  
उन दिनों यही लोक मान्यता थी कि हर समुन्नत व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति एवं विभूतियों को एक बड़ा भाग समाज की उन्नति में-सुख शांति की अभिवृद्धि में लगाना चाहिए. आत्मोष्कर्ष की तरह लोक कल्याण भी मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए. प्राचीन काल में प्रत्येक भारतवासी की वैसी मान्यता, निष्ठा और रीति-नीति थी।