गोरखपुर. धार्मिक किताबें छापने वाले गीता प्रेस (Gita Press) को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया में एक खबर चल रही है कि प्रेस की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए नये साल पर गीता प्रेस की 'डायरी' गीता दैनन्दिनी को लेकर गीता प्रेस की आर्थिक मदद की जाए.

‘नो प्रॉफिट-नो लॉस’ पर काम करती है गीता प्रेस
इस मैसेज की सच्चाई जानने के लिए न्यूज-18 की टीम ने गीता प्रेस के टस्ट्री देवी दयाल अग्रवाल से बात की. सोशल मीडिया पर चल रही आर्थिक स्थिति खराब होने की खबर पर देवी दयाल अग्रवाल ने कहा कि गीता प्रेस ‘नो प्रॉफिट-नो लॉस’ पर काम करती है. हम लोग लागत से भी कम दाम पर किताब उपलब्ध कराते हैं. साथ ही गीता प्रेस किसी से भी डोनेशन (चंदा) नहीं लेती है इसलिए इस तरह की बातें पूरी तरह से निराधार हैं.


15 दिसम्बर से ही आउट ऑफ स्टॉक हो गई गीता दैनन्दिनी
उन्होंने बताया कि जहां तक गीता दैनन्दिनी की बात है तो 15 दिसम्बर से ही आउट ऑफ स्टॉक हो गया. लगातार आर्डर आ रहे हैं पर अब इस साल हम लोग इसे छापने में सक्षम नहीं हैं. गीता दैनन्दिनी को सोशल मीडिया पर ‘डायरी’ बताने पर गीता प्रेस के उत्पाद प्रबंधक लालमणि तिवारी का कहना है कि ये डायरी नहीं बल्कि एक छोटा पंचाग है. जिसे लोग लेकर आसानी से चल सकते हैं.

ये डायरी नहीं पंचांग है: लालमणि तिवारी
लालमणि तिवारी ने बताया कि इस पंचाग को लेकर लोग अपने धार्मिक कामों भी करते हैं, महिलाएं व्रत रखती हैं, साथ ही इसमें हर पेज पर गीता के वाक्य लिखे हैं. जिसका मकसद है कि जो भी व्यक्ति इसे खोले वो गीता के स्लोकों को भी पढ़े और मनन करें.वैसे प्रेस ने अपने आधिकारिक ट्विवटर हैंडल से भी गीता दैनन्दिनी के पूरी तरह समाप्त होने की जानकारी दी और शुभचिंतकों का आभार जताया है.नो प्राफिट और नो लॉस के रुप में चलने वाली गीता प्रेस की स्थापना गोरखपुर में 1923 में की गई थी. गीता प्रेस का सफर 10 रुपये के किराये के मकान में चालू हुआ था, आज गीता प्रेस में 15 भाषाओं में करीब 1800 पुस्तकें छपती है. गीता प्रेस में आज भी 2 रुपये की धार्मिक किताबें उपलब्ध हैं. गीता प्रेस अपनी स्थापना से लेकर अब तक 70 करोड़ से अधिक धार्मिक किताबें बेंच चुका है. प्रेस लगातार आधुनिकता की चादर में सराबोर होकर तेजी से आगे बढ़ रहा है और लोगों तक सस्ती धार्मिक किताबें उपलब्ध करा रहा है.