जलौकसोअनुशास्त्राणां (चरक सूत्र स्थान २५/४०) जलौका शस्त्र न होते हुए भी शस्त्र की तरह क्रिया करने वाले अनुशस्त्रों इ सर्वश्रेष्ठ हैं। इन्हे जलौका इसलिए कहा जाता हैं की ये मुख्य रूप से जल में ही पाई जाती हैं। (जलमासायुरीति जलायुका यानी जल हैं आयु जिनकी, जलमासामोक इति
जलौकसः --जल हैं घर जिनका )
जलौका द्वारा रक्तावसेचन परम सुकुमार उपाय हैं और नृप, धनी, बाल, वृद्ध, भीरु, नीरू दुर्बल तथा मृदु प्रकृति वालों में भी इनका प्रयोग आसानी से किया जा सकता हैं। (जालौकसस्तु सुखीनां
रक्तस्रवाय योजयेत (वागभट्ट सूत्र २६-३५ ) परम सुकुमरोआय शोणितवासेचानोपायोभिहितो जलौकसः -- सुश्रुत सूत्र स्थान १३-३ )यध्यपि सर्वाणि सर्वेवा के अनुसार जलौकाओं का रुधिर विश्रावणके लिए सभी अवस्थाओं में प्रयोग विहित हैं तथापि इनका मुख्य रूप से पित्तोपास्रष्ट रुधिर को निकालनेके लिए प्रयोग किया जाता हैं जिसका कारण यह बताया गया हैं की ये शीतल जल में उतपन्न
होने के कारण शीत प्रकृति होती हैं और पित्तहर हैं। (शीताधिवासा मधुरा जलौका वारिसंभवा। तसमापित्तोपसृष्टे तू हिता सा तव्वसेचने --सुश्रुत सूत्र स्थान १३/६ )
जलौकाएँ दो प्रकार की होती हैं १ सविष २ निर्विष
एक महत्वपूर्ण बात यह हैं की जलौका जिस जल में पैदा होती हैं उसी जल में ही जीवित रहती हैं। 
शरीर में ऐसी कई बीमारियां हैं जो लीच यानी की जोंक थेरेपी के उपयोग से कंट्रोल की जा सकती है।
लीच थेरेपी बहुत लंबे समय से चलन में है। प्राचीन मिस्र, भारत, अरब और ग्रीक जैसे देशों में त्वचा रोगों, प्रजनन और दांत से जुड़ी समस्याओं, तंत्रिका तंत्र में परेशानी और सूजन को दूर करने के लिए इस थेरेपी का उपयोग किया जाता है।
लीच थेरेपी एक अनोखी उपचार पद्धति है जिसे हिरुडोथेरेपी के नाम से भी जाना जाता है। लीच यानी जोंक हीमेटोफैगस जीव हैं। इसके लार और अन्य स्रावों में कई जैविक रूप से सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। ये यौगिक कई बीमारियों के इलाज में कारगर होते हैं।
हृदय रोग दूर करे 
लीच थेरेपी का उपयोग हृदय रोगों के उपचार में किया जाता है। लीच द्वारा उत्पन्न लार में मौजूद रक्त प्राकृतिक रुप से पतला होता है जो रक्त के थक्के को जमने नहीं देता है। यह अस्थायी रूप से रक्त प्रवाह और हाइपरलेग्जिया में सुधार कर सकता है। साथ ही संयोजी ऊतकों में दर्द के प्रति संवेदनशीलता बढ़ता है। 
नस की सूजन कम करे
एक स्टडी के अनुसार, लीच थेरेपी से पैर में सूजन और दर्द कम हो जाता है। इसके साथ ही त्वचा के रंग में सुधार होता है। लीच थेरेपी से पैर की नस में रक्त का थक्का नहीं बनता है जिससे पैदल चलने की क्षमता में सुधार होता है। इसके लिए संक्रमित हिस्से में चार से छह लीच थेरेपी की प्रक्रिया की आवश्यकता होती है।
मधुमेह को रोकता है
डायबिटीज मेलेटस में रक्त शर्करा के स्तर में वृद्धि से गंभीर लक्षण और जटिलताएं उत्पन्न हो सकती है। लीच थेरेपी गैंग्रीन और हृदय रोगों की तरह डायबिटीज की विभिन्न जलिटलाओं के इलाज में व्यापक रूप से उपयोग की जाती है। लीच के लार में हीरुडिन नामक पेप्टाइड पाया जाता है जो परिधीय रक्त वाहिकाओं में रक्त के प्रवाह में सुधार करता है और रक्त का थक्का नहीं जमने देता है
सुनने की क्षमता में सुधार
लीच थेरेपी का उपयोग सुनने की क्षमता में सुधार के लिए किया जाता है। साथ ही कान में सूजन और टिनिटस को दूर करता है। एक स्टडी के अनुसार, लीच थेरेपी में दो लीच का इस्तेमाल किया जाता है। एक लीच कान के पीछे और दूसरे कान के सामने। स्टडी में इस प्रक्रिया को 3-4 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार किया गया और स्थिति में सुधार देखा गया।
दर्द दूर करे
एक स्टडी से पता चला है कि लीच थेरेपी ऑस्टियोआर्थराइटिस के लक्षणों के उपचार में अधिक प्रभावी है। लीच के लार में मौजूद हिरुदिन पेप्टाइड गठिया के रोगियों में सूजन और दर्द को कम करने में मदद करता है। यह थेरेपी एक सप्ताह के भीतर विकलांगता में सुधार कर सकता है।
दांत की समस्या दूर करे
लीच में डेस्टेबिलस नामक प्रोटीन पाया जाता है, जो एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर होता है। यह पीरियोडोंटाइटिस और एल्वोलर एब्सिसेज जैसे दांत के संक्रमण को दूर करने में मदद करता है। एक स्टडी के अनुसार, लीच में पाए जाने वाले एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकता है और इम्यून सिस्टम को संक्रमण से बचाता है। शरीर के कई विकारों को दूर करने के लिए लीच थेरेपी का उपयोग किया जाता है। यह कई दवाओं की अपेक्षा काफी तेजी से काम करता है।