महाराज दशरथ की कई रानियां थीं। महारानी कौशल्या पट्टमहिषी थीं। महारानी कैकेयी महाराज को सर्वाधिक प्रिय थीं और शेष में श्री सुमित्रा जी ही प्रधान दीं। महाराज दशरथ प्राय: कैकेयी के महल में ही रहा करते थे। सुमित्रा जी महारानी कौशल्या के सन्निकट रहना तथा उनकी सेवा करना अपना धर्म समझती थीं। पुत्रेष्टि-यज्ञ समाप्त होने पर अग्नि के द्वारा प्राप्त चरु का आधा भाग तो महाराज ने कौशल्या जी को दिया। शेष का आधा कैकेयी को प्राप्त हुआ। चतुर्थांश जो शेष था, उसके दो भाग करके महाराज ने एक भाग कौशल्या तथा दूसरा कैकेयी के हाथों पर रख दिया।

दोनों रानियों ने उसे सुमित्रा जी को प्रदान किया। समय पर माता सुमित्रा ने दो पुत्रों को जन्म दिया। कौशल्या जी के दिए भाग के प्रभाव से लक्ष्मण जी श्री राम के और कैकेयी जी द्वारा दिए गए भाग के प्रभाव से शत्रुघ्न जी श्री भरत जी के अनुगामी हुए। वैसे चारों कुमारों को रात्रि में निद्रा माता सुमित्रा की गोद में ही आती थी। सबकी सुख-सुविधा, लालन-पालन तथा क्रीड़ा का प्रबंध माता सुमित्रा ही करती थीं।

अनेक बार माता कौशल्या श्री राम को अपने पास सुला लेतीं। रात्रि में जागने पर वह रोने लगते। माता रात्रि में ही सुमित्रा के भवन में पहुंच कर कहती, ''सुमित्रा, अपने राम को लो। इन्हें तुम्हारी गोद के बिना निद्रा ही नहीं आती। देखो इन्होंने रो-रो कर आंखें लाल कर ली हैं।''

श्री राम सुमित्रा की गोद में जाते ही सो जाते।

पिता से वनवास की आज्ञा पाकर श्री राम ने माता कौशल्या से तो आज्ञा ली किन्तु सुमित्रा के समीप वह स्वयं नहीं गए। वहां उन्होंने केवल लक्ष्मण को भेज दिया। माता कौशल्या श्री राम को रोक कर कैकेयी का विरोध नहीं कर सकती थीं, किन्तु सुमित्रा जी के संबंध में यह बात नहीं थी। यदि न्याय का पक्ष लेकर वह अड़ जातीं तो उनका विरोध करने का साहस किसी में नहीं था। लक्ष्मण जी द्वारा श्री राम के साथ वन जाने के लिए आज्ञा मांगने पर माता सुमित्रा जी ने जो उपदेश दिया वह उनके विशाल हृदय का सुंदर परिचय है :

तात तुम्हारी मातु बैदेही। पिता रामु सब भांति स्नेही॥
अवध तहां जहं राम निवासू। तहंइं दिवसु जहं भानु प्रकासू।
जौं पै सीय रामु बन जाहीं। अवघ तुम्हार काजु कछु नाहींं॥
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू॥
तुम्ह कहुं बन सब भांति सुपासू। संग पितु मातु रामु सिय जासू॥
जेङ्क्षह न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥

इस प्रकार माता सुमित्रा ने लक्ष्मण को जीवन के सर्वोत्तम उपदेश के साथ अपना आशीर्वाद भी दिया। माता सुमित्रा का ही वह आदर्श हृदय था कि प्राणाधिक पुत्र को उन्होंने कह दिया कि ''लक्ष्मण! तुम श्री राम को दशरथ, सीता को मुझे और वन को अयोध्या जान कर सुखपूर्वक श्री राम के साथ वन जाओ।''

दूसरी बार माता सुमित्रा के गौरवमय हृदय का परिचय वहां मिलता है जब लक्ष्मण रणभूमि में आहत होकर मूर्छित पड़े थे। यह समाचार जानकर माता सुमित्रा की दशा विचित्र हो गई। उन्होंने कहा, ''लक्ष्मण! मेरा पुत्र! श्री राम के लिए युद्ध में लड़ता हुआ गिरा। मैं धन्य हो गई। लक्ष्मण ने मुझे पुत्रवती होने का सच्चा गौरव प्रदान किया।''

महर्षि वशिष्ठ ने न रोका होता तो सुमित्रा जी ने अपने छोटे पुत्र शत्रुघ्न को भी लंका जाने की आज्ञा दे दी थी।

''तात जाहु कपि संग'' और शत्रुघ्न भी जाने के लिए तैयार हो गए थे। लक्ष्मण को आज्ञा देते हुए माता सुमित्रा ने कहा था, ''राम सीय सेवा सूची ह्वै हौ, तब जानी हौं सही सुत मेरे।''

इस सेवा की अग्नि में तप कर लक्ष्मण जब लौटे तभी उन्होंने उनको हृदय से लगाया। सुमित्रा जी जैसा त्याग का अनुपम आदर्श और कहीं मिलना असंभव है।